You are currently viewing रूद्रा और महादेव

रूद्रा और महादेव

सनातन और त्रिदेव

नमस्ते भगवान रुद्र भास्करामित तेजसे। नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयात्मने।।
हे मेरे भगवान! हे मेरे रूद्र, अनंत सूर्यो से भी तेज आपका तेज है।

रूद्र संसार की वह अलौकिक शक्ति है जिससे सभी सजीव प्राणी पेड़ पौधे पशु पक्षी, जल नभ पृथ्वी को चलायमान रखती है।
रूद्र ने संसार में वैमनस्य को मिटाने, एक प्राणी को दूसरे प्राणी के जीवन में सहयोग करने संसार को समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाने के लिये अपने तीन रूपों को जन्म दिया, जिन्हें हम ब्रह्मा विष्णु महेश के नाम से जानते हैं। ब्रह्मा जिनको इस संसार को पोषित करने की ज़िम्मेदारी दी गयी ब्रह्मा जी पूरे संसार के लिये नये नये सृजन करते लोगों की शिक्षा चिकित्सा और व्यवसाय की व्यवस्था को सुदृढ़ और मज़बूत बनाने में लगे रहते, वहीं विष्णु जी संसार में ब्रह्मा जी के साथ मिलकर हर प्राणी को सुरक्षित रखने उनके आपसी मत भेदों को सुलझाने का काम करते। कहीं भी कोई अप्रिय घटना ना हो समस्त मानव जाति प्रेम से रहें इसके लिये विष्णु जी हमेशा इसका ध्यान रखते।
शिव को विनाशक कहा जाता है वह सृष्टि का विनाश करते थे ।

शिव ने कहा था कि मैं तो बैरागी हूँ न सम्मान का मोह न अपमान का भय ,जो मैं हूँ वो मैं नहीं हूँ ,और जो मैं नहीं हूँ वो ही मैं हूँ,मैं आदि हूँ

मैं ही अनंत हूँ, जब तक तुम जीवित हो तब तक मैं तुम में हूँ ,मृत्यू के पश्चात तुम मुझमें हो ,,मै शिव हूँ ,मैं ही भैरव हूँ, ब्रम्हांड से लेके एक तृण तक मैं ही मैं हूँ।

समस्त संसार खुशहाल और समृद्ध था लेकिन शिवपुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्‍णु दोनों में सर्वोच्चता को लेकर लड़ाई हो गई, तो बीच में कालरूपी एक स्तंभ आकर खड़ा हो गया।

तब ज्योतिर्लिंग रूप काल ने कहा- ‘पुत्रों, तुम दोनों ने मुझसे जन्म तुम्हें संसार सुव्यवस्थित रूप को चलाने की ज़िम्मेदारी दी गयी थी और तुम दोनों स्वयं को एक दूसरे बड़ा समझने में झगड़ रहे हो तो इस प्रकार इस संसार को नहीं चलाया जा सकता मैं तुम दोनों का विनाश करने के लिये बाध्य हूँ ब्रह्मा जी और विष्णु जी जानते थे कि हमारा विनाश इस प्रकार संभव नहीं है

ज्योतिर्लिंगम् रूपी काल ने ब्रह्मा जी पर पहले अपनी शक्ति का प्रहार किया, ब्रह्मा जी जलकर राख हो गये लेकिन उस राख के ढेर से फिर आवाज़ आई हो महादेव, मै कहीं नहीं गया हूँ. मै यही पर हूँ. देखो , आपके विनाश के कारण इस राख की रचना हुई. और जहाँ भी रचना होती है वहां मैं होता हूँ. इसलिए मै आपकी शक्तियों से भी समाप्त नहीं हुआ.” और ब्रह्मा जी वहाँ प्रकट हो गये।

विष्णु जी मुस्कुरा रहे थे तब काल रूपी ज्योतिर्लिंग ने अपनी शक्ति का प्रहार विष्णु जी पर किया और वो भी जलकर राख का ढेर हो गये।

विष्णु जी के स्थान पर अब वहां राख का ढेर था लेकिन उनकी आवाज़ राख के ढेर से अब भी आ रही थी कि हे “महादेव , मै अब भी यही हूँ. कृपा रुके नहीं. अपनी शक्तियों का प्रयोग इस राख पर भी कीजिये. तब तक मत रुकिए जब तक कि इस राख का आखिरी कण भी ख़त्म न हो जाये.”
रूद्र ने अपनी सारी शक्तियों का प्रयोग किया लेकिन राख का एक कण ख़त्म नहीं हुआ।
तब ब्रह्मा और विष्णु जी बोले कि हमें तुमने ही जन्म दिया हम तुम्हारे ही अंग है तो हमारा विनाश असंभव है।

यह सब कुछ काल रूपी ज्योतिर्लिंग शिव देख रहे थे तब शिव बोले कि इनका विनाश मेरे विनाश के साथ ही संभव है जब तक मैं हूँ ये भी रहेंगे।

भगवान् शिव ने स्वयं का विनाश कर लिया और जैसा वे सोच रहे थे वैसा ही हुआ. जैसे ही वे जलकर राख का ढेर बने,ब्रह्मा और विष्णु भी राख में बदल गए. कुछ समय के लिए सब कुछ अंधकारमय हो गया. वहां उन तीनो देवो की राख के सिवाय कुछ नहीं था. उसी राख के ढेर से एक आवाज़ आई – “मै ब्रह्मा हूँ. मै देख सकता हूँ कि यहाँ राख की रचना हुई है. जहाँ रचना होती है , वहां मै होता हूँ.” इस तरह उस राख से पहले ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए और उसके बाद विष्णु और शिव जी क्योंकि जहाँ रचना होती है वहां पहले सुरक्षा आती है और फिर विनाश. इस तरह शिव जी को बोध हुआ कि त्रिदेव का विनाश असंभव है. इस घटना की स्मृति के रूप में भगवान् शिव ने उस राख को अपने शरीर से लेप लिया जिसे शिव भस्म कहा जाता है.

ब्रह्मा जी ने दुबारा से सृष्टि की रचना की और फिर संसार सुचारू रूप से चलायमान हो गया , लेकिन समय के साथ साथ मनुष्य का स्वभाव बदलने लगा।शक्ति और वैभव को पाने के लिये लोग आपस में लड़ने लगे जिससे संसार में दो जातियों का जन्म हुआ जिन्हें देवता और दैत्य के नाम से जाना जाता है।

208

आदि दूत

सनातन ही अनन्त है, सनातन ही अनादि है। सनातन से पहले कुछ नहीं था, सनातन के बाद कुछ नहीं रहेगा। आप लोग सोचेंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ, क्योंकि इसके पीछे कुछ कारण हैं। सनातन सृष्टि के सृजन की मूल है।सनातन कोई धर्म नहीं है

Leave a Reply