त्रिदेव

त्रिदेव
हमारे शास्त्रों के अनुसार त्रिदेव सृष्टि के तीन स्तंभ है। जिनमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश को बताया गया है। इन तीनों के कार्य अलग हैं। ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं विष्णु सृष्टि की देखभाल करते हैं और महेश विनाश करते हैं। अगर सही शब्दों में समझा जाये तो यह वह व्यवस्था है जिसमें किसी समाज को सुदृढ़, सुसंस्कृत, सुन्दर बनाकर सुचारू रूप से चलाया जाये।जिसमें ब्रह्मा पूरी सृष्टि में विकास का कार्य करते हैं शिक्षा और रोज़गार के संसाधन बनाते है। विष्णु सारी सृष्टि की क़ानून व्यवस्था को बनाये रखने का कार्य करते हैं और महेश यानि शिव न्याय देने का काम करते हैं।जिसको विनाश से जोड़ दिया गया है लेकिन शिवजी के कार्यों का सीधा मतलब था अपराधियों को सजा देना और निष्पक्ष न्याय करना।
शिवजी न्याय के देवता हैं इसीलिए वह कहते हैं कि ना कोई मेरा ना पराया ना कोई मित्र ना कोई शत्रु इसका सीधा मतलब है कि अगर आप न्याय करते समय संबंधों को ध्यान में रखोगे तो निष्पक्ष न्याय नहीं कर पाओगे, जो न्याय करता है उसको वैरागी होना चाहिये।
त्रिदेव काल में ये तीनों मिलकर समाज को सुचारू रूप से चलाते थे, इनको संचालित करने के लिये किसी प्रधान की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि तीनों एक ही शक्ति से संचालित थे और वह शक्ति अदृश्य थी।
हमारा संविधान भी इसी त्रिदेव को आधार मानकर बनाया गया है। इसके भी तीन स्तंभ है । व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्याय पालिका। यह तीनों भी आपस में एक दूसरे से जुड़े हैं इन तीनों को चलाने के लिये इनके ऊपर एक अदृश्य शक्ति को रखा गया है जिसको राष्ट्रपति का नाम दिया गया है।
सबसे बड़ी समस्या क्या है आज ना तो कार्यपालिका अपने कर्तव्यों का सही से निर्वाह कर रही है ना ही व्यवस्थापिका अपना सही काम कर रही है, न्यायपालिका की बात तो छोड़ ही दो वह वैराग्य तो क्या न्याय को बेचकर धनोपार्जन के कार्य में लिप्त है। न्यायपालिका को शिवजी जैसा होना चाहिये। व्यवस्थापिका को विष्णु जैसा होना चाहिये और कार्यपालिका को ब्रह्मा जैसा होना चाहिये तभी सनातन का मूल स्वभाव जगत में साकार होगा।
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आदि दूत

सनातन ही अनन्त है, सनातन ही अनादि है। सनातन से पहले कुछ नहीं था, सनातन के बाद कुछ नहीं रहेगा। आप लोग सोचेंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ, क्योंकि इसके पीछे कुछ कारण हैं। सनातन सृष्टि के सृजन की मूल है।सनातन कोई धर्म नहीं है

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